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Archive for April, 2011

pal

हादसों की भीड़ में एक दिन बन कर रह गया

ना दिल समझा ना हम समझे

एक अधूरे पन्ने सा दिल में बस कर रह गया

वो सुबह का सूरज थे मद्धे मद्धे

किरणों की महिम्गी देख कर दिल सोचता रह गया

उस कारवां में और क्या जताते

बस एक पल था ओस की तरह दिल में बस कर रह गया

उस मंजर को हम काश बयां कर पाते

नजरो में क़ैद हो कर हमारे दिल में बस कर रह गया

जुबान पर आते आते वो फिर बेजुबान सा रह गया….

हवाओ के खेल में हम कही उड़ पाते

पर दिल हमारा किनारे पे बंधी कश्ती की तरह रह गया

वो उठती लहरों में हम धुल जाते

पर मौज सा उठ कर अल्फाजो में जम कर रह गया

वो दिन फिर हमारे दिल को छु कर कागज पे रह गया…!!!!

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